एक राज्य में एक ब्राह्मण के चार बेटे थे। चारों ने खूब पढ़ाई की और अलग-अलग क्षेत्रों में महारत हासिल की।
पहले भाई ने सीख लिया कि मरे हुए जीव की हड्डियों को देखकर यह कैसे पता लगाया जाए कि वह किस जानवर की हैं, और उन हड्डियों को सही क्रम में कैसे जोड़ा जाए।
दूसरे भाई ने सीखा कि उन हड्डियों पर मांस, चमड़ी और खून कैसे चढ़ाया जाए।
तीसरे भाई ने सीखा कि उस शरीर में वापस प्राण (जान) कैसे फूंके जाएं।
चौथा भाई व्यवहारिक और समझदार था। उसने कोई जादुई विद्या तो नहीं सीखी, लेकिन उसमें संसारिक समझ बहुत कूट-कूट कर भरी थी।
एक दिन चारों भाई अपनी किस्मत आजमाने के लिए दूसरे शहर जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक घने जंगल से गुजरना पड़ा। वहां उन्हें किसी जानवर की बिखरी हुई हड्डियां दिखीं।
अपनी विद्या के घमंड में पहले भाई ने कहा, "देखो, मैं अपनी विद्या से बता सकता हूँ कि ये हड्डियां एक शेर की हैं। मैं इन्हें जोड़कर इसका ढांचा तैयार कर देता हूँ।" उसने पलक झपकते ही हड्डियों को जोड़ दिया।
यह देखकर दूसरे भाई से रहा नहीं गया। उसने कहा, "मैं इस पर मांस, त्वचा और खून लगा देता हूँ, ताकि यह बिल्कुल असली शेर जैसा दिखे।" उसने भी अपनी विद्या का चमत्कार दिखा दिया। अब उनके सामने एक मरा हुआ, लेकिन बिल्कुल असली दिखने वाला शेर पड़ा था।
तीसरा भाई तुरंत आगे बढ़ा और बोला, "अब मैं इसमें प्राण फूंककर इसे जिंदा करूँगा!"
यह सुनते ही चौथे भाई (जिसके पास व्यावहारिक बुद्धि थी) ने उसे रोका और कहा, "रुको भाई! ऐसा मत करो। यह एक शेर है। अगर तुमने इसे जिंदा कर दिया, तो यह सबसे पहले हमीं को मारकर खा जाएगा।"
लेकिन तीसरे भाई को अपनी विद्या का प्रदर्शन करना था। उसने ताना मारते हुए कहा, "तुम डरपोक हो! मैं अपनी इतनी महान विद्या को बेकार नहीं जाने दूँगा।"
चौथे भाई ने भांप लिया कि ये मानने वाले नहीं हैं। उसने समझदारी दिखाई और कहा, "ठीक है, अगर तुम्हें अपनी जिद पूरी ही करनी है, तो मुझे एक मिनट का समय दो।" ऐसा कहकर वह तेजी से पास के एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया।
तीसरे भाई ने मंत्र पढ़ा और शेर के शरीर में जान डाल दी।
जैसे ही शेर जिंदा हुआ, उसने जोर से दहाड़ मारी। सामने खड़े तीनों भाई अपनी विद्या के अहंकार में इतने डूबे थे कि उन्हें भागने का मौका ही नहीं मिला। शेर ने एक ही झटके में तीनों भाइयों पर हमला किया और उन्हें मार कर खा गया।
जब शेर वहां से चला गया, तब चौथा भाई पेड़ से नीचे उतरा। उसने दुखी मन से अपने भाइयों की मूर्खता पर शोक व्यक्त किया और अकेला ही अपने घर लौट आया।
कहानी खत्म करने के बाद, बेताल पेड़ पर लटके हुए शव के रूप में राजा विक्रम की पीठ पर हंसते हुए बोला:
"हे राजन! अब बताओ कि उन चारों भाइयों में से सबसे बड़ा पापी या उन तीनों की मौत का असली जिम्मेदार कौन था? याद रखना, अगर तुमने जानते हुए भी सही उत्तर नहीं दिया, तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे!"
राजा विक्रम ने गहरी सांस ली और कहा:
"बेताल, उन तीनों की मौत का जिम्मेदार तीसरा भाई था, जिसने शेर में प्राण फूंके थे।
पहले भाई ने सिर्फ हड्डियां जोड़ीं (यह जानने के लिए कि वह कौन सा जानवर था)।
दूसरे भाई ने केवल मांस-चमड़ी चढ़ाई (एक मृत शरीर को आकार दिया)।
चौथा भाई तो उन्हें रोक ही रहा था।
लेकिन तीसरे भाई ने यह जानते हुए भी कि वह एक हिंसक और खतरनाक शेर है, सिर्फ अपने अहंकार और विद्या के प्रदर्शन के लिए उसमें जान डाल दी। उसने अपनी व्यावहारिक बुद्धि का इस्तेमाल नहीं किया। इसलिए, अपने भाइयों की हत्या का असली पाप उसी के सिर जाता है।"
जैसे ही राजा विक्रम ने अपनी चुप्पी तोड़ी और सही जवाब दिया, बेताल जोर से हंसा और बोला, "शाबाश राजन, तुमने सही जवाब दिया! लेकिन हमारी शर्त के मुताबिक तुम बोल पड़े, इसलिए मैं चला!"
और बेताल हवा में उड़कर वापस अपने पेड़ पर जा लटका। विक्रम ने एक बार फिर तलवार खींची और बेताल को वापस लाने के लिए पेड़ की तरफ चल दिए।

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