चार अमूल्य रत्न
एक शांत गाँव में एक वृद्ध संत रहते थे। दूर-दूर से लोग उनके पास जीवन की समस्याओं का समाधान पाने आते थे। संत का जीवन बहुत सादा था, लेकिन उनके विचार अनमोल थे। उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुँचकर उन्हें महसूस हुआ कि अब उनका समय अधिक शेष नहीं है। उन्होंने अपने चारों बेटों को अपने पास बुलाया।
चारों बेटे पिता के चरणों में बैठ गए। संत ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बेटों, मेरे पास धन-दौलत तो नहीं है, लेकिन मैं तुम्हें चार ऐसे रत्न देना चाहता हूँ, जो तुम्हारे जीवन को सुख, शांति और आनंद से भर देंगे।”
बेटों ने उत्सुकता से पूछा, “पिताजी, वे कौन से रत्न हैं?”
संत ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—
*पहला रत्न — माफी*
संत बोले,
“यदि कोई तुम्हारा अपमान करे, बुरा कहे या तुम्हारे साथ गलत व्यवहार करे, तो उसके प्रति मन में बदले की भावना मत रखना। उसे क्षमा कर देना। क्रोध मन को जलाता है, जबकि माफी आत्मा को शांति देती है।”
फिर उन्होंने एक घटना सुनाई।
एक बार गाँव का एक व्यक्ति संत को बहुत अपशब्द कह रहा था। लेकिन संत शांत रहे। लोगों ने पूछा, “आपने उसे जवाब क्यों नहीं दिया?”
संत मुस्कुराए और बोले, “यदि कोई हमें उपहार दे और हम उसे स्वीकार न करें, तो वह उपहार किसके पास रहेगा? उसी प्रकार मैंने उसके कटु शब्द स्वीकार ही नहीं किए।”
चारों बेटे पिता की बात ध्यान से सुनते रहे।
*दूसरा रत्न — भूल जाना*
संत ने आगे कहा,
“यदि तुम किसी की मदद करो, तो उसे भूल जाओ। कभी यह उम्मीद मत रखना कि सामने वाला तुम्हारा उपकार लौटाएगा। सच्चा उपकार वही है, जिसमें प्रतिफल की इच्छा न हो।”
उन्होंने बताया कि एक बार उन्होंने एक गरीब किसान की सहायता की थी। वर्षों बाद वह किसान बड़ा व्यापारी बन गया, लेकिन उसने कभी संत को याद नहीं किया। फिर भी संत के मन में उसके लिए कोई शिकायत नहीं थी।
“क्योंकि,” संत बोले, “जिस उपकार को बार-बार याद किया जाए, वह व्यापार बन जाता है, सेवा नहीं।”
*तीसरा रत्न — विश्वास*
संत ने अपने बेटों का हाथ पकड़कर कहा,
“जीवन में सबसे बड़ी शक्ति विश्वास है। अपनी मेहनत और परमात्मा पर अटूट भरोसा रखो। कठिन समय में यही विश्वास तुम्हें संभालेगा।”
उन्होंने समझाया कि जीवन में कई बार इंसान मेहनत करता है, लेकिन सफलता देर से मिलती है। ऐसे समय में जो व्यक्ति विश्वास बनाए रखता है, वही अंततः विजय प्राप्त करता है।
“ईश्वर कभी किसी का परिश्रम व्यर्थ नहीं जाने देता,” संत ने कहा।
*चौथा रत्न — वैराग्य*
अब संत की आँखों में गहराई उतर आई।
उन्होंने कहा,
“यह संसार नश्वर है। एक दिन सबको इस दुनिया से जाना है। इसलिए धन, मोह और लोभ में इतना मत उलझो कि जीवन का आनंद ही खो दो।”
उन्होंने आगे कहा,
“जिस व्यक्ति का मन संतोष से भरा होता है, वही वास्तव में सबसे धनी होता है।”
चारों बेटे भावुक हो उठे। उन्होंने पिता के चरणों में सिर रख दिया। संत ने आशीर्वाद देते हुए कहा—
“जब तक तुम इन चार रत्नों — माफी, भूल जाना, विश्वास और वैराग्य — को अपने जीवन में संभालकर रखोगे, तब तक कोई भी दुख तुम्हें पराजित नहीं कर पाएगा।”
उस दिन के बाद चारों बेटों ने पिता की सीख को अपने जीवन का आधार बना लिया। समय बीतता गया, लेकिन वे सदैव शांत, प्रसन्न और संतुष्ट रहे।
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
श्रीमद् भागवत् में कृष्ण जन्म से जुड़ी अनेक कथाएँ हैं। ऐसी मान्यता है कि किसी देवता, किसी भगवान को उनके बालपन वाले रूप में दर्शन करना अपने आप में एक अत्यंत दुर्लभ घटना है, जिसके लिए देवता लोग भी युगों तक राह देखते हैं। एक लोकप्रिय कहानी के अनुसार, एक बार भगवान शिव भी योगी का रूप धारण कर गोकुल आए थे, ताकि भगवान कृष्ण को बाल रूप में देख सकें। इस पूरे दृष्टांत पर अनेक भजन गाए गए हैं। तथापि, इस घटना से जुड़ी हुई एक और कहानी भी है, जिसके विषय में चंद लोगों को ही जानकारी है।
श्रीमद् भागवत् के अनुसार यह देख कर कि भगवान शिव को भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप में दर्शन करने के लिए किन किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, ऋषि नारद ने भगवान शिव तथा भगवान कृष्ण, दोनों को आमने सामने ही पूछ लिया। नारद ऋषि यह जान कर गद-गद हो गए कि भगवान शिव व भगवान कृष्ण, दोनों ही एक दूसरे को “भगवान” कह कर संबोधित करते थे, और दोनों यह बताते थे कि वह दूसरे के भक्त हैं। उस समय ऋषि नारद ने उन दोनों से विनती की कि आखिर कौन किसका भक्त है, यह सच्चाई बताई जाए।
तब भगवान शिव ने प्रकट किया कि वे तो हमेशा से ही भगवान कृष्ण के भक्त रहे हैं और जिस जिस रूप में उन्होंने अवतार लिया है, शिव ने एक भक्त बन कर, सेवक के रूप में कृष्ण की सेवा की है। भगवान शिव ने यह भी सूचना दी कि वे तो भगवान कृष्ण के सबसे बड़े भक्त हैं। यह सुन कर भगवान कृष्ण मुस्कुराए और तुरंत प्रत्युत्तर दिया कि चूँकि भगवान शिव उनके भक्त हैं, इसलिए वे स्वत: ही उनके (शिव के) भक्त हो जाते हैं। यह वार्तालाप सुन कर नारद ऋषि की आँखों से आंसू बहने लगे और वह दोनों देवताओं के आगे नतमस्तक हो गए।
यह उन अनेक उदाहरणों में पहला अवसर था जब भगवान कृष्ण ने यह कहा है कि वे अपने भक्तों के सेवक हैं। यह उस लोकप्रिय मान्यता को भी उद्धृत करता है कि भले ही श्री कृष्ण समूचे ब्रह्मांड के लिए भगवान हों, परंतु वे सदैव अपने भक्तों की इच्छाओं का ही पालन करेंगे। जैसे भगवान शिव को “देवों के देव” माना जाता है, भगवान कृष्ण को “भक्तों के भक्त” के रूप में जाना जाता है।
बहुत से लोग संसार में सेवा परोपकार आदि अच्छे कर्म करते हैं। लंबे समय तक भी करते हैं।परंतु वे उन अच्छे कर्मों के फल की आशा समाज के लोगों से रखते हैं।
कभी-कभी समाज के लोग उन्हें उनके उत्तम कर्मों का फल धन सम्मान आदि दे भी देते हैं। और कभी कभी उनका ध्यान उस ओर नहीं भी जाता, अथवा कम जाता है। *"अथवा कुछ पक्षपाती लोग उन्हें जानबूझकर भी सम्मानित नहीं करते। उनके उत्तम कर्मों का फल नहीं देते। ऐसी स्थिति में वे परोपकारी लोग दुखी हो जाते हैं।"* और कभी कभी तो वे ईश्वर को भी कोसने लगते हैं, कि *"हे ईश्वर! मैं 20-30 वर्षों से देश धर्म समाज की सेवा कर रहा हूं, और मुझे कोई भी व्यक्ति मेरे अच्छे कर्मों का फल ही नहीं दे रहा। तथा आप भी नहीं दे रहे।"*
लोग यह शिकायत तो करते हैं कि *"मुझे मेरे उत्तम कर्मों का फल अब तक क्यों नहीं मिला? पर ऐसी बात नहीं कहते, कि 20-30 वर्षों से किए गए मेरे पाप कर्मों का फल मुझे अब तक क्यों नहीं मिला?"*
वेद आदि शास्त्रों का संदेश ऐसा है, कि *"ईश्वर न्यायकारी है। वह सब को सदा देखता है। परंतु समय आने पर सबके कर्मों का फल देता है, समय से पहले नहीं। ईश्वर अच्छे कर्मों का अच्छा फल देता है, और बुरे कर्मों का बुरा फल देता है। अतः यदि आपको आपके उत्तम कर्मों का फल अभी तक नहीं मिला, तो समय आने पर अवश्य मिलेगा।"*
दूसरी बात -- *"आपको समाज के लोगों से अपने परोपकार आदि उत्तम कर्मों के फल की आशा कम ही रखनी चाहिए। क्योंकि समाज की ओर से आपके उत्तम कर्मों का फल मिल भी सकता है, और नहीं भी। इसका कारण यह है, कि आप उत्तम कर्म करते हुए समाज की नौकरी नहीं कर रहे। आप तो ईश्वर की नौकरी कर रहे हैं। जो व्यक्ति जिस सेठ की नौकरी करता है, तो उसे अपने वेतन आदि फल की आशा भी उसी सेठ से करनी चाहिए, न कि जनता से।"*
इस प्रकार से जब आप कोई समाज सेवा परोपकार आदि उत्तम कर्म करते हैं, तो यह ध्यान रहे, कि आप ईश्वर के आदेश का पालन कर रहे हैं, समाज के आदेश का नहीं। आप ईश्वर की नौकरी कर रहे हैं, समाज की नहीं। तो जब आप ईश्वर के आदेश का पालन कर रहे हैं, तो फल की आशा भी उसी से रखनी चाहिए। और ऐसा सोचना चाहिए कि *"यदि मुझे समाज ने कोई फल नहीं दिया, तो फल की क्या चिंता है? मैं समाज की नौकरी थोड़े ही कर रहा हूं। मैं तो ईश्वर की नौकरी कर रहा हूं। ईश्वर समय आने पर मेरे उत्तम कर्मों का फल अवश्य ही देगा। चाहे इस जन्म में दे, चाहे अगले जन्म में दे। वह न्यायकारी है, अवश्य ही फल देगा।"*
*"ऐसा सोचने पर फिर आप कभी भी दुखी नहीं होंगे। निराश उदास या चिंतित नहीं होंगे। कभी संशय में नहीं पड़ेंगे कि मेरे उत्तम कर्मों का फल मिलेगा या नहीं मिलेगा?"*
इसलिए ईश्वर से ही फल की आशा रखें। वह समय आने पर अवश्य फल देगा। जो लोग ऐसा कहते हैं, कि *"कर्म तो करो, परन्तु फल की इच्छा मत करो।" "यह बहुत बड़ा झूठ है। क्योंकि ऐसा कहने वाले लोग स्वयं भी फल की इच्छा रखते हैं। चाहे समाज फल देवे, चाहे ईश्वर देवे। कोई न कोई तो फल देवे ही। जरा सोचिए, यदि कोई व्यक्ति फल की इच्छा न करे, तो वह कर्म ही क्यों करेगा?"*
इसलिए सत्य यही है कि *"व्यक्ति पहले फल की बात सोचता है, उसके बाद ही कर्म करता है।"* जैसे कोई व्यक्ति किसी कंपनी में नौकरी करता है, तो पहले पूछता है, कि *"मुझे वेतन कितना मिलेगा?"* यदि उसे स्वीकार हो, तो ही वह नौकरी करेगा। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है, कि *"बिना फल की इच्छा के कोई व्यक्ति कुछ भी कर्म नहीं करता।"*
हां, इतना तो हो सकता है, कि *"कोई व्यक्ति सांसारिक फल धन सम्मान आदि की इच्छा करके कर्म करे, अथवा कोई व्यक्ति मोक्ष फल की इच्छा करके कर्म करे। बिना फल की इच्छा के तो कर्म करना जीवात्मा के लिए असंभव है।"* इसका कारण यह है, कि *"उसमें स्वभाव से बहुत सी कमियां हैं। अपनी उन कमियों को पूरा करने के लिए वह फल की इच्छा करता है।" "आत्मा को बहुत कुछ चाहिए। जैसे उसे धन सम्मान भोजन वस्त्र मकान पुत्र परिवार संपत्ति और घर में काम आने वाले पचासों साधन चाहिएं, और फिर अंत में मोक्ष भी चाहिए। इसलिए वह पहले फल के विषय में सोचता है, उसके बाद ही वह कर्म करता है।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*
राधे राधे जय श्री कृष्ण
सदा मुस्कुराते रहो 😊

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