मिट्टी, व्यापार और मारवाड़ी : राजस्थान की बदलती तक़दीर की कहानी
बहुत पुरानी बात नहीं, जब राजस्थान की धरती पर राजा और किसान के बीच रिश्ता केवल कर का नहीं, बल्कि भरोसे का हुआ करता था।
रेगिस्तान की उस तपती मिट्टी में जब किसान बीज बोता था, तो राजा भी उसके साथ आस लगाए बैठा रहता था।
उन दिनों युद्ध कोई दूर की बात नहीं थी। हर राजा जानता था कि अगर युद्ध हुआ, तो अनाज, घोड़े, ऊँट और रसद सब कुछ किसानों से ही आएगा।
इसीलिए फसल अच्छी होती तो कर लगता, और अगर अकाल पड़ जाए तो राजा स्वयं कर माफ़ कर देता। किसान जानता था—राजा उसका है।
लेकिन समय बदला…
जब अंग्रेज आए।
अब युद्ध की ज़िम्मेदारी अंग्रेज़ी सेना ने ले ली। राजा को न किसान की ज़रूरत रही, न उसकी मजबूरी की चिंता।
कर बढ़ा दिए गए—चाहे फसल हो या न हो।
किसानों का सब्र टूटा।
कोटा, धौलपुर, भरतपुर—हर तरफ़ आवाज़ उठी।
हल छोड़कर हाथों में विरोध के नारे थे।
पहली बार राजस्थान का किसान समझ गया कि अब सत्ता उसकी नहीं, किसी और की ज़रूरत देखती है।
उधर, शहरों में करघों की आवाज़ धीरे-धीरे खामोश हो रही थी।
भारत की कपड़ा उद्योग कभी दुनिया में मशहूर थी।
मुलायम मलमल, बारीक छींट—विदेशी व्यापारी इन्हें सोने से तौलते थे।
पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने चाल चली।
उन्होंने कपास महँगे दामों पर खरीद ली, जिससे भारतीय बुनकर कच्चे माल से ही वंचित हो गए।
और फिर इंग्लैंड की मशीनों से बना सस्ता, चमकदार कपड़ा भारत में भर दिया।
नतीजा?
कारखाने बंद।
करघे टूटे।
हज़ारों हाथ बेरोज़गार।
शहरों की गलियों में अब हुनर नहीं, भूख घूमती थी।
लेकिन एक समय ऐसा भी था जब राजस्थान सिर्फ़ रेत नहीं, रास्ता था।
दिल्ली से अफ़ग़ानिस्तान, सिंध और मध्य एशिया को जोड़ने वाले स्थलीय व्यापार मार्ग यहीं से गुजरते थे।
कारवाँ चलते थे—ऊँटों की कतारें, घोड़ों की टापें, और व्यापार की खुशहाली।
राजा सुरक्षा कर लेते,
सेठ सौदे तय करते,
मज़दूर, गाड़ीवान, हम्माल—हज़ारों लोगों को रोज़गार मिलता।
राजस्थान उस दौर में भारत की धड़कन था।
फिर अंग्रेज़ों ने बंबई बंदरगाह बनाया।
समुद्री रास्ते सस्ते और तेज़ थे।
स्थलीय मार्ग सूने पड़ गए।
कारवाँ रुक गए, सराय वीरान हो गईं।
राजस्थान की अर्थव्यवस्था जैसे एक झटके में ठहर गई।
लेकिन हर संकट से अवसर भी जन्म लेता है।
राजस्थान के व्यापारी—मारवाड़ी सेठ—यह समझ चुके थे।
उन्होंने ऊँट छोड़े, जहाज़ पकड़े।
बंबई, कलकत्ता, मद्रास—जहाँ व्यापार दिखा, वहीं डेरा डाला।
अंग्रेज़ों ने उन्हें सुरक्षा दी, कर्ज़ दिया, रेलवे दी।
और मारवाड़ियों ने देश का व्यापार थाम लिया।
एक कहावत तब जन्मी—
“जहाँ ना पहुँचे बैलगाड़ी, वहाँ पहुँचे मारवाड़ी।”
1822 में कुचामन से निकला एक मारवाड़ी परिवार महीनों की यात्रा के बाद गुवाहाटी पहुँचा।
नई ज़मीन, नई भाषा—पर वही पुरानी समझ और भरोसा।
अंग्रेज़ अफ़सर तक कहते थे—
“भारत में व्यापार करना है तो राजस्थानी सीखो।”
इतना ही नहीं, इन्हीं व्यापारियों ने आगे चलकर महात्मा गांधी के आंदोलनों को भी धन से सहारा दिया।
लाभ के साथ राष्ट्र भी उनका हिसाब था।
राजस्थान की यह कहानी सिर्फ़ पतन की नहीं, संघर्ष, समझ और पुनर्जन्म की है।
जहाँ किसान ने अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाई,
जहाँ कारीगर ने टूटते करघों में भी स्वाभिमान बचाया,
और जहाँ मारवाड़ी व्यापारी ने बदलते समय के साथ चलकर इतिहास में अपनी जगह बनाई।
रेत में दबे ये क़िस्से आज भी बताते हैं—
जो हालात को समझ ले, वही इतिहास बनाता है।


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें