अंधेरे में चमकते सितारे
गाँव के किनारे एक छोटा-सा घर था, जहाँ रामदास अपनी पत्नी और बेटे के साथ रहता था। कभी उसके पास भी सब कुछ था—खेती, सम्मान और मुस्कुराता हुआ परिवार। लेकिन एक साल लगातार सूखा पड़ा, फसल बर्बाद हुई और कर्ज़ का बोझ बढ़ता चला गया।
मुसीबतें ऐसी आईं कि मानो जीवन ने अंधेरा ओढ़ लिया हो।
कभी-कभी रामदास खुद से कहता—
“भगवान, क्या मैंने इतना बड़ा पाप किया है?”
लेकिन फिर उसे कहीं पढ़ी एक पंक्ति याद आती—
“सितारे कभी अंधेरे के बिना नहीं चमकते।”
गाँव में एक व्यक्ति था—माधव सेठ। धन का अंधा, मद का अंधा। उसे न किसी की तकलीफ दिखती थी, न अपनी गलतियाँ। रामदास जब कर्ज़ की मोहलत माँगने गया, सेठ ने तिरस्कार से कहा—
“काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, और मैं व्यापार में भावनाएँ नहीं रखता।”
रामदास टूट गया, लेकिन उसी दिन रास्ते में उसे एक बूढ़े साधु मिले। साधु ने कहा—
“बेटा, दुनिया की असली अंधता आँखों की नहीं होती।
आँख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती,
काम के अंधे को विवेक नहीं,
मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं,
और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता।”
रामदास की आँखों में आँसू आ गए। साधु आगे बोले—
“लेकिन याद रखना, मन से ज्यादा ऊपजाऊ जगह और कोई नहीं।
यहाँ जो बोओगे, वही बढ़ेगा—प्यार बोओगे तो प्यार, विचार बोओगे तो भविष्य।”
उस दिन रामदास ने ठान लिया। उसने इच्छाओं की लंबी सड़क छोड़ दी और ज़रूरतों की गली में मुड़ गया।
बड़े सपनों की जगह छोटे प्रयास शुरू किए।
खाली पड़ी ज़मीन में सब्ज़ियाँ उगाईं,
गाँव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया,
और हर सुबह भगवान राम का नाम लेकर मेहनत में जुट गया।
समय लगा… पर बदलाव आया।
सब्ज़ियाँ बिकने लगीं,
बच्चों की फीस से थोड़ा-थोड़ा सहारा मिला,
और सबसे बड़ी बात—उसके मन में उम्मीद का बीज अंकुरित हो गया।
कुछ साल बाद वही माधव सेठ बीमार पड़ा, अकेला।
रामदास, जिसके पास अब बहुत धन नहीं लेकिन बहुत विवेक था, उसे देखने गया।
सेठ की आँखें भर आईं।
रामदास ने मन ही मन कहा—
“सच है… अंधेरा जरूरी था, तभी आज मैं चमक पा रहा हूँ।”
उस सुबह सूरज कुछ अलग ही चमक रहा था।
बटुए की फोटो
खचाखच भरी बस में कंडक्टर को एक गिरा हुआ बटुआ मिला जिसमे एक पांच सौ का नोट और भगवान् कृष्ण की एक फोटो थी।
वह जोर से चिल्लाया , ” अरे भाई! किसी का बटुआ गिरा है क्या?”
*अपनी जेबें टटोलने के बाद सीनियर सिटीजन सीट पर बैठा एक आदमी बोला, “हाँ, बेटा शायद वो मेरा बटुआ होगा… जरा दिखाना तो.”*
“दिखा दूंगा- दिखा दूंगा, लेकिन चाचाजी पहले ये तो बताओ कि इसके अन्दर क्या-क्या है?”
“कुछ नहीं इसके अन्दर थोड़े पैसे हैं और मेरे कृष्णा की एक फोटो है.”, चाचाजी ने जवाब दिया।
“पर कृष्णा की फोटो तो किसी के भी बटुए में हो सकती है, मैं कैसे मान लूँ कि ये आपका है.”, कंडक्टर ने सवाल किया।
अब चाचाजी उसके बगल में बैठ गए और बोले, “बेटा ये बटुआ तब का है जब मैं हाई स्कूल में था. जब मेरे बाबूजी ने मुझे इसे दिया था तब मेरे कृष्णा की फोटो इसमें थी।
*लेकिन मुझे लगा कि मेरे माँ-बाप ही मेरे लिए सबकुछ हैं इसलिए मैंने कृष्णा की फोटो के ऊपर उनकी फोटो लगा दी…*
*जब युवा हुआ तो लगा मैं कितना हैंडसम हूँ और मैंने माँ-बाप के फोटो के ऊपर अपनी फोटो लगा ली…*
*फिर मुझे एक लड़की से प्यार हो गया, लगा वही मेरी दुनिया है, वही मेरे लिए सबकुछ है और मैंने अपनी फोटो के साथ-साथ उसकी फोटो लगा ली… सौभाग्य से हमारी शादी भी हो गयी.*
*कुछ दिनों बाद मेरे बेटे का जन्म हुआ, इतना खुश मैं पहले कभी नहीं हुआ था…सुबह-शाम, दिन-रात मुझे बस अपने बेटे का ही ख़याल रहता था…*
*अब इस बटुए में मैंने सबसे ऊपर अपने बेटे की फोटो लगा ली…*
*पर अब जगह कम पड़ रही थी, सो मैंने कृष्णा और अपने माँ-बाप की फोटो निकाल कर बक्से में रख दी…*
*और विधि का विधान देखो, फोटो निकालने के दो-चार साल बाद माता-पिता का देहांत हो गया… और दुर्भाग्यवश उनके बाद मेरी पत्नी भी एक लम्बी बीमारी के बाद मुझे छोड़ कर चली गयी.*
*इधर बेटा बड़ा हो गया था, उसकी नौकरी लग गयी, शादी हो गयी…* *बहु-बेटे को अब ये घर छोटा लगने लगा, उन्होंने अपार्टमेंट में एक फ्लैट ले लिया और वहां चले गए.*
*अब मैं अपने उस घर में बिलकुल अकेला था जहाँ मैंने तमाम रिश्तों को जीते-मरते देखा था…*
*पता है, जिस दिन मेरा बेटा मुझे छोड़ कर गया, उस दिन मैं बहुत रोया… इतना दुःख मुझे पहले कभी नहीं हुआ था…कुछ नहीं सूझ रहा था कि मैं क्या करूँ और तब मेरी नज़र उस बक्से पर पड़ी जिसमे सालों पहले मैंने कृष्णा की फोटी अपने बटुए से निकाल कर रख दी थी…*
*मैंने फ़ौरन वो फोटो निकाली और उसे अपने सीने से चिपका ली…
*अजीब सी शांति महसूस हुई…लगा मेरे जीवन में तमाम रिश्ते जुड़े और टूटे… लेकिन इन सबके बीच में मेरे भगवान् से मेरा रिश्ता अटूट रहा… मेरा कृष्णा कभी मुझसे रूठा नहीं…*
*और तब से इस बटुए में सिर्फ मेरे कृष्णा की फोटो है और किसी की भी नहीं… और मुझे इस बटुए और उसमे पड़े पांच सौ के नोट से कोई मतलब नहीं है, मेरा स्टॉप आने वाला है…तुम बस बटुए की फोटो मुझे दे दो…मेरा कृष्णा मुझे दे दो…*
*कंडक्टर ने फौरन बटुआ चाचाजी के हाथ में रखा और उन्हें एकटक देखता रह गया.*

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